भारत में बकरी पालन (Goat Farming) एक लोकप्रिय और लाभदायक व्यवसाय है। दूध और मांस उत्पादन के लिए बकरी की विभिन्न नस्लें पाली जाती हैं। बकरी का दूध पोषण से भरपूर होता है और इसके मीट की मांग पूरे वर्ष बनी रहती है। यहां भारत की प्रमुख बकरी नस्लों की जानकारी दी जा रही है:
1. जमुनापारी बकरी
- स्थान: उत्तर प्रदेश और आसपास के इलाके
- खासियत: लंबी टांगें, पक्षीनुमा चेहरा, हल्के भूरे धब्बे
- दूध उत्पादन: 2-2.5 किलो/दिन
- मांस की मांग: बाजार में अधिक
- अन्य: पहली बार बच्चे को जन्म 20-25 महीने की उम्र में देती है।
2. बीटल बकरी
- स्थान: पंजाब, हरियाणा
- रंग: काला या भूरा, धब्बों के साथ
- दूध उत्पादन: 1-2 किलो/दिन
- खासियत: मजबूत शरीर, कम देखभाल में भी टिकाऊ।
- मांस: स्वादिष्ट और पोषणयुक्त
3. बारबरी बकरी
- स्थान: उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली
- खासियत: छोटे आकार की, प्रजनन क्षमता ज्यादा
- दूध उत्पादन: 1.5-2 किलो/दिन
- प्रजनन दर: साल में 2-3 बच्चे
4. सिरोही बकरी
- स्थान: राजस्थान
- खासियत: लालिमा युक्त कोट, कठोर जलवायु में टिकाऊ
- दूध उत्पादन: 71 किलो/175 दिन
- मांस: बिना पेस्टिसाइड और रसायनों के।
- प्रजनन दर: 60% मामलों में जुड़वां बच्चे।
5. कन्नी आडू बकरी
- स्थान: तमिलनाडु
- खासियत: सूखे क्षेत्रों के लिए उपयुक्त
- प्रजनन दर: साल में 2-3 बच्चे
- रंग: काले-सफेद धब्बों के साथ
6. ब्लैक बंगाल बकरी
- स्थान: पश्चिम बंगाल, असम, ओडिशा
- खासियत: छोटे आकार की, उच्च प्रजनन दर
- दूध उत्पादन: 53 किलो/90-120 दिन
- मांस: गुणवत्ता में उत्कृष्ट
7. चांगथांगी या पश्मीना बकरी
- स्थान: जम्मू-कश्मीर, लद्दाख
- खासियत: पश्मीना शॉल के लिए प्रसिद्ध ऊन
- वजन: नर और मादा – 20 किलोग्राम
- अन्य: ठंडी और ऊंचाई वाले इलाकों में टिकाऊ।
8. मारवाड़ी बकरी
- स्थान: राजस्थान का मारवाड़ क्षेत्र
- खासियत: कम संसाधनों में टिकाऊ
- रंग: काला, सफेद, भूरा
9. तोता परी बकरी
- स्थान: राजस्थान, गुजरात
- खासियत: सुंदर दिखने वाली नस्ल
- दूध और मांस दोनों के लिए उपयुक्त।
10. उस्मानाबादी बकरी
- स्थान: महाराष्ट्र
- खासियत: सूखे और कठोर परिस्थितियों में टिकाऊ
- दूध उत्पादन: औसतन 1-1.5 किलो/दिन
बकरी पालन भारत में एक लाभदायक व्यवसाय है। सही नस्ल का चयन और उनकी देखभाल से किसान दूध और मांस उत्पादन के जरिए अच्छी आय अर्जित कर सकते हैं। प्रत्येक नस्ल की अपनी विशेषताएं और क्षेत्रीय अनुकूलन हैं, जो किसानों की आय को बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं।
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